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पत्र

Dear सखे,                कृष्ण जन्माष्ठमी की हार्दिक बधाई! प्रिये,      ईश्वर ने आपको बहुत कुछ दिया है-समझदारी, सुंदरता, प्रेम, सद्बुद्धि, ज्ञान और कुशलता। आज आपकी परीक्षा भी है और हम सबका व्रत भी। कृष्ण का जीवन संघर्ष और प्रेम का जीवन है, दुख से त्राण दिलाकर खुशी और वैभव की ओर सरलता के साथ ले जाना उनका दर्शन है। वे प्रेम के सहारे आनंद को निम्मज्जित करते हैं। उनके होठों पर मुस्कान का वैभव है। वे हृदय को जीत लेने के लिए पर्याप्त है।               हम तुच्छ मानव जो उनके अंश मात्र हैं। हम इच्छा , अनिच्छा  , गुण -अवगुण के पुतले हैं। प्रेम ही से हम इस जीवन को खुशहाल बना सकते हैं तथा उसे जीत सकते हैं। प्रेम अपने आप में एक वैभव है,मोतियों का खान है। और ये मोती प्रेम के जरिये ही आकार पाता है-कभी अश्रु कण बनकर, कभी चुंबन का बोसा बनकर। आज के दिन मैं मिलना चाहता था। इन आँखों में आपकी सूरत को सामने से जीना चाहता था। आपके प्रेम व स्नेह को , जैसा कि कृष्ण का दर्शन है-अनुभवकर , पाकर इस मानव जीवन को, इसकी...

शास्त्रीय भाषा पालि

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पालि को क्लासिकल लैंग्वेज बनाने के संबंध में डॉ.हरेराम सिंह ने भी राष्ट्रपति को लिखा था पत्र  .......... बिहार के सुप्रसिद्ध कवि - आलोचक डॉ.हरेराम सिंह ने भी पालि भाषा को क्लासिकल लैंग्वेज बनाने की मांग, उसकी प्राचीनता व  समृद्ध साहित्य के आधार पर सन् 2021 में महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर किया था । पालि भाषा और साहित्य के संबंध में डॉ. हरेराम सिंह ने बताया कि पालि भाषा भारतीय संस्कृति व दर्शन के विराटपन का साक्षी रही है। यह बुद्ध के उपदेश की भाषा रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश तो पालि की क्रोड भूमि रही है । राजगृह, वैशाली, नालंदा, अरवल(उरुवेला), गया, सासाराम, सारनाथ और कुशीनगर (कुशनगर) में बुद्ध ने इसी भाषा में अपने उपदेश दिए थे । पालि भाषा का साहित्य विपुल ज्ञान का भंडार है । इसकी प्राचीनता के लिए बुद्ध( 563 ई.पू. - 483 ई.पू. ) का जीवन काल ही पर्याप्त है। हमारे यहां प्रचलित रुख, रुख्खी, चक्का, चच्चा, ऊख आदि शब्द पालि के हैं। डॉ.हरेराम सिंह पालि को शास्त्रीय भाषा बनाए जाने पर खुशी प्रकट की , साथ ही केंद्र सरकार के इस दूरदर्शी पहल के लिए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी क...

समकालीन

हिंदी साहित्य की समकालीनता को जानने समझने के लिए जनवादी साहित्य के साथ साथ आदिवासी साहित्य ,दलित साहित्य,ओबीसी साहित्य ,बहुजन साहित्य और अर्जक साहित्य की अवधारणा से परिचित होना जरुरी है.इनमें अर्जक साहित्य का लेखन भी बहुत हुआ है.बोकारो में बहुत से अर्जक साहित्यकार अर्जक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिये थे.अर्जक साहित्य का मुख्य स्वर इहलौकिकता के खिलाफ है.भाग्य ,भगवान ,पाखँड इनके साहित्य से नदारद है.कुल मिलाकर यह साहित्य पुरोहितवाद व अश्रमिक वर्ग -जिसे जोंक वर्ग कहते हैं ;के विरोध में खडा है.इससे हिंदी साहित्य की गतिशीलता का पता चलता है. ओबीसी साहित्य क्या है ?जानना चाहते हैं धान के खेतों में जाइए और देखिए छह माह का बच्चा पथारी पर सोया है माँ धान काट रही है और पिता बगल के खेत में जनक की तरह हल चला रहे .

मंडल आयोग और ओबीसी साहित्य

ओबीसी की समस्याओं और उपलब्धियों को रेखांकित करना प्रत्येक ओबीसी का धर्म है।ओबीसी भारतीय समाज का वैज्ञानिक कलासीफिकेशन है,अतएव ऐसा साहित्य जो इस क्लाफीकेशन को संपूर्णता में प्रतिबिंबित करता है,वह ओबीसी साहित्य ही है। देश भर में ओबीसी लेखकों की कमी नहीं है और न ही उनके द्वारा रचित साहित्य की कमी है,बस जरूरत है यह बताने की कि फलां ओबीसी लेखक हैं। अगर ओबीसी लेखक संगठन बनता है,तो ओबीसी लेखक और उनका साहित्य स्वत: स्पष्ट हो जाएगा,लोलो-पोपो या कनफ्यूजन नाम की कोई बात रह ही नहीं जाएगी। मतलब,ओबीसी लोगों के लिए ,ओबीसी द्वारा लिखा गया साहित्य ही ओबीसी साहित्य है।ओबीसी पर शोध करने के लिए सभी फ्री हैं।फिलहार सीडी सिंह की पत्रिका "पहचान" ओबीसी साहित्य को प्रमुखता से छाप रही है। कौन प्रयासरत हैं ,की जगह सभी ओबीसी लेखक प्रयासरत हो जाएं,तो कोई किसी का मुंह ताकने वाली बात ही नहीं रह जाएगी। पर,दूसरे के द्वारा लिखा साहित्य ओबीसी साहित्य होगा कि नहीं यह फ्यूचर बताएगा,कारण कि ओबीसी के मिजाज को गैरों द्वारा लिखा ओबीसी साहित्य कितना ताकत दे रहा है,यह तो पूरी ओबीसी बिरादरी व ओबीसी के मान्य एक्सपर्ट बन...

ककही

ककही से बाल झाड़े बच्चे मुस्कुराते ,हंसते बच्चे