शास्त्रीय भाषा पालि

पालि को क्लासिकल लैंग्वेज बनाने के संबंध में डॉ.हरेराम सिंह ने भी राष्ट्रपति को लिखा था पत्र 
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बिहार के सुप्रसिद्ध कवि - आलोचक डॉ.हरेराम सिंह ने भी पालि भाषा को क्लासिकल लैंग्वेज बनाने की मांग, उसकी प्राचीनता व  समृद्ध साहित्य के आधार पर सन् 2021 में महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर किया था । पालि भाषा और साहित्य के संबंध में डॉ. हरेराम सिंह ने बताया कि पालि भाषा भारतीय संस्कृति व दर्शन के विराटपन का साक्षी रही है। यह बुद्ध के उपदेश की भाषा रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश तो पालि की क्रोड भूमि रही है । राजगृह, वैशाली, नालंदा, अरवल(उरुवेला), गया, सासाराम, सारनाथ और कुशीनगर (कुशनगर) में बुद्ध ने इसी भाषा में अपने उपदेश दिए थे । पालि भाषा का साहित्य विपुल ज्ञान का भंडार है । इसकी प्राचीनता के लिए बुद्ध( 563 ई.पू. - 483 ई.पू. ) का जीवन काल ही पर्याप्त है। हमारे यहां प्रचलित रुख, रुख्खी, चक्का, चच्चा, ऊख आदि शब्द पालि के हैं। डॉ.हरेराम सिंह पालि को शास्त्रीय भाषा बनाए जाने पर खुशी प्रकट की , साथ ही केंद्र सरकार के इस दूरदर्शी पहल के लिए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के इस कथन - पालि और प्राकृत भारतीय संस्कृति की मूल रूट हैं , के लिए उन्हें और केंद्रीय कैबिनेट को बधाई दी। 
डॉ.हरेराम सिंह ने यह भी बताया कि शास्त्रीय भाषा के लिए किसी भाषा को 1500-2000 साल प्राचीन होना वांछनीय है। भारत सरकार ने सबसे पहले 12 अक्टूबर 2004 को तमिल को शास्त्रीय भाषा का विशेष दर्जा दिया था फिर संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम , उडिया उस श्रेणी की भाषा में सम्मिलित की गईं । इस बार अक्टूबर 2024 में पालि के साथ प्राकृत, बांग्ला, असमिया तथा मराठी को शास्त्रीय ( अभिजात ) भाषा का दर्जा दिया गया है। बातचीत में डॉ.सिंह ने अपनी चाह व्यक्त की कि बिहार के गया या सासाराम में पालि भाषा के संवर्धन व विकास के लिए विशेष अध्ययन केंद्र अलग से खोलने की जरूरत है ताकि इस भाषा में उपलब्ध प्राचीन एवम् नवीन ग्रंथों का संरक्षण किया जा सके, इसका विकास हो सके और इनसे जुड़े शोध कार्य को बढ़ावा दिया जा सके ।

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